भारत का खिलौना पारितंत्र

पाठ्यक्रम: जीएस-3 / अर्थव्यवस्था

सन्दर्भ

  • केंद्रीय वित्त मंत्री ने कहा कि भारत उच्च गुणवत्ता मानकों, नीतिगत समर्थन, कौशल विकास तथा बेहतर बाज़ार पहुँच के माध्यम से वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी खिलौना विनिर्माण पारितंत्र का निर्माण कर रहा है।

भारत का खिलौना विनिर्माण पारितंत्र

  • वर्ष 2025–26 में भारत का खिलौना निर्यात 186 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया तथा भारतीय खिलौने अब 153 देशों में पहुँच रहे हैं।
  • वर्ष 2019 के बाद से खिलौनों के आयात में 71% की कमी आई है, जो गुणवत्ता-केंद्रित तथा आत्मनिर्भर विनिर्माण की सफलता को दर्शाती है।
  • भारत का खिलौना बाज़ार 2034 तक 5 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है।
  • खेल एवं खिलौना क्षेत्र में रोजगार 2018–19 के 8,685 से बढ़कर 2023–24 में 17,693 हो गया, अर्थात् इसमें दो गुना से अधिक वृद्धि हुई।

महत्व

  • आयात प्रतिस्थापन: वर्ष 2018–19 के बाद से खिलौनों के आयात में उल्लेखनीय कमी आई है, जिससे भारत की उन चीनी निर्माताओं पर निर्भरता घटी है, जिनका पहले भारत के खिलौना बाज़ार में 80% से अधिक हिस्सा था।
  • निर्यात वृद्धि: भारत कुछ क्षेत्रों में शुद्ध आयातक से प्रतिस्पर्धी निर्यातक के रूप में उभरा है।
  • रोजगार की संभावनाएँ: यह श्रम-प्रधान क्षेत्र है, जो विशेषकर चन्नापटना (कर्नाटक) और कोंडापल्ली (आंध्र प्रदेश) जैसे पारंपरिक खिलौना निर्माण केंद्रों में पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए रोजगार के अवसर प्रदान करता है।
  • सांस्कृतिक सॉफ्ट पावर में भूमिका: भारतीय पौराणिक कथाओं, स्वतंत्रता संग्राम तथा पारंपरिक खेलों पर आधारित स्वदेशी खिलौने आर्थिक लाभ के साथ-साथ भारत की सांस्कृतिक सॉफ्ट पावर को भी सुदृढ़ करते हैं।
  • MSME आधारित विकास: भारत की 90% से अधिक खिलौना विनिर्माण इकाइयाँ सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) क्षेत्र से संबंधित हैं, जिससे इस क्षेत्र के विकास को बल मिलेगा।

सरकारी पहल

  • राष्ट्रीय खिलौना कार्ययोजना (National Action Plan for Toys – NAPT), 2020: भारतीय मूल्यों, संस्कृति और इतिहास पर आधारित खिलौनों के डिज़ाइन को बढ़ावा देने के लिए तैयार की गई।
  • यह पहल खिलौनों की गुणवत्ता की निगरानी करती है तथा निम्न-स्तरीय एवं असुरक्षित खिलौनों के आयात पर प्रतिबंध लगाती है।
  • गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (2020): निम्न-स्तरीय तथा असुरक्षित, विशेषकर चीन से आने वाले खिलौनों के आयात पर रोक लगाने के लिए खिलौनों हेतु भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) का प्रमाणन अनिवार्य किया गया।
  • टॉय बिज़ इंटरनेशनल B2B प्रदर्शनी: यह प्रदर्शनी खिलौना निर्माताओं को अपने उत्पाद घरेलू एवं अंतर्राष्ट्रीय खरीदारों के समक्ष प्रदर्शित करने का मंच प्रदान करती है।
  • टॉयकैथॉन (Toycathon): वर्ष 2021 में प्रारंभ किया गया। यह आत्मनिर्भर भारत के दृष्टिकोण को समर्थन देता है तथा विद्यार्थियों, शिक्षकों, डिज़ाइनरों, विशेषज्ञों और स्टार्ट-अप्स द्वारा नवाचारी खिलौनों एवं खेलों के संयुक्त विकास को प्रोत्साहित करता है।
  • इलेक्ट्रॉनिक खिलौना क्षेत्र को सुदृढ़ करने के लिए सरकार ने 2025 में पहली बार इलेक्ट्रॉनिक टॉय हैकाथॉन (e-Toycathon) का आयोजन भी किया।
  • ई-टॉयज़ लैब (e-Toys Lab): इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) द्वारा सी-डैक (C-DAC), नोएडा में स्थापित यह प्रयोगशाला भारत के स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिक खिलौना उद्योग को सुदृढ़ बनाने का उद्देश्य रखती है।
  • मानक मंथन: वर्ष 2026 में भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने मानक मंथन का आयोजन किया, जिसका केंद्रबिंदु खिलौनों की यांत्रिक एवं भौतिक सुरक्षा आवश्यकताएँ थीं। यह विभिन्न उद्योगों में भारतीय मानकों को अपनाने को बढ़ावा देने हेतु BIS की एक पहल है।
  • एक जिला, एक उत्पाद (ODOP): इस पहल का उद्देश्य देश के प्रत्येक जिले के विशिष्ट उत्पादों की पहचान, ब्रांडिंग एवं प्रोत्साहन के माध्यम से जिला-विशिष्ट उत्पादों को बढ़ावा देना है।
  • भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्राप्त खिलौने: भारत के अनेक पारंपरिक खिलौनों को उनकी विशिष्ट शिल्पकला एवं क्षेत्रीय पहचान के लिए GI दर्जा प्रदान किया गया है।
  • GI टैग प्राप्त खिलौनों में कर्नाटक के चन्नापटना खिलौने एवं गुड़िया, मध्य प्रदेश के इंदौर के चमड़े के खिलौने, तमिलनाडु की तंजावुर गुड़िया आदि शामिल हैं।
  • GST में कमी: खिलौनों पर GST को 12% से घटाकर 5% किए जाने से वे उपभोक्ताओं के लिए अधिक किफायती और सुलभ हो गए हैं।
  • मुक्त व्यापार समझौते (FTA): भारत ने संयुक्त अरब अमीरात, ऑस्ट्रेलिया, यूरोपीय संघ, ओमान, यूनाइटेड किंगडम तथा न्यूज़ीलैंड के साथ व्यापार समझौते किए हैं। इन समझौतों के अंतर्गत भागीदार देश भारतीय खिलौनों के निर्यात के लिए शून्य-शुल्क बाज़ार पहुँच प्रदान करते हैं।

चुनौतियाँ

1. प्रौद्योगिकी अंतर 

  • अधिकांश खिलौना निर्माता अभी भी छोटे एवं पारंपरिक हैं तथा उनमें वैश्विक प्रतिस्पर्धियों के समान स्वचालन (Automation) और उन्नत डिज़ाइन क्षमता का अभाव है।

2. कच्चे माल पर निर्भरता 

  • खिलौना निर्माण में प्रयुक्त प्लास्टिक, इलेक्ट्रॉनिक घटक तथा विशेष प्रकार की सामग्री का बड़ा भाग अभी भी आयात किया जाता है।

3. अनुसंधान, विकास एवं डिज़ाइन नवाचार की कमजोरी 

  • खिलौना डिज़ाइन संस्थानों तथा नवाचार पारितंत्र की सीमित उपलब्धता के कारण इलेक्ट्रॉनिक एवं शैक्षिक खिलौनों जैसे उच्च मूल्य वाले क्षेत्रों में भारत की उपस्थिति सीमित है।

4. छोटे उद्योगों पर अनुपालन का बोझ 

  • भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) का अनिवार्य प्रमाणन छोटे कुटीर एवं हस्तशिल्प आधारित इकाइयों के लिए अनुपालन लागत बढ़ा देता है, जिससे उनके औपचारिक बाज़ार से बाहर होने का जोखिम रहता है।

5. पुनः मार्गित(Re-routed) आयातों से प्रतिस्पर्धा

  • ऐसी रिपोर्टें हैं कि अधिक आयात शुल्क से बचने के लिए खिलौनों को गलत लेबलिंग अथवा तीसरे देशों के माध्यम से मार्ग परिवर्तित करके भारत में लाया जा रहा है, जिससे घरेलू उद्योग को प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है।

निष्कर्ष

  • भारत का खिलौना उद्योग अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक प्रगति के साथ सफलतापूर्वक जोड़ते हुए विनिर्माण, निर्यात और रोजगार का एक सशक्त क्षेत्र बनकर उभर रहा है।
  • स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा देने वाली रणनीतिक नीतिगत पहलों और विभिन्न कार्यक्रमों के समर्थन से यह क्षेत्र आयात-निर्भरता से आगे बढ़कर वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता की दिशा में अग्रसर हुआ है।

स्रोत: AIR

 

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